**“घर वाले कहीं खो गए…
घर कभी खाली नहीं होता, बस लोग कम हो जाते हैं। भाई कमाने निकल गया, बहन ससुराल चली गई एक ही घर के दो चिराग, अलग-अलग दुनिया में खो गए जो आंगन कभी हंसी से गूंजता था, आज वहां सन्नाटा सोता है। मां की आंखें दरवाजे पर टिकी हैं, पिता चुपचाप सब कुछ ढोता है एक रोटी चार टुकड़ों में बंटती थी, आज थाली पूरी रह जाती है। जिस घर में शोर कम नहीं होता था, अब घड़ी की टिक-टिक सुनाई आती है। वक्त ने क्या खेल रचाया है, सब अपने होकर भी दूर हो गए। एक ही छत के नीचे पलने वाले, आज अलग-अलग जहां में मजबूर हो गए और सच कहूं तो, घर आज भी वही है, बस “घर वाले” कहीं खो गए। **“कमरे वही हैं… बस आवाजें बदल गई हैं।”**
